शुक्रवार, २२ फेब्रुवारी, २०१९

बलूचिस्तान, जो 255 दिनों तक आजाद देश रहा


बलूचिस्तान, जो 255 दिनों तक आजाद देश रहा


बलूचिस्तान में अशांति का माहौल क्यों है? क्या है वहां का इतिहास और कैसे बलूचिस्तान पाकिस्तान का हिस्सा बना. आइए जानने हैं, क्‍योंकि इसी में परेशानी की जड़ है.


दरअसल बलूचिस्तान की जड़ें भारत विभाजन से जुडी हुई हैं. विभाजन में तय हुआ कि भारत और पाकिस्तान दो अलग राष्ट्र होंगे. लेकिन उन रियासतों को लेकर कोई सीधा फैसला नहीं हुआ जो ब्रिटिश साम्राज्य के आधीन तो थी पर उनपर ब्रिटिश हुकूमत का सीधा शासन नहीं था. ऐसी रियासतें अपने आंतरिक फैसले लेने के लिए स्वतंत्र थी और कुछ संधियों के तहत ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा थी. बलूचिस्तान (कलात,  खारान, लॉस बुला, मकरान) ऐसी रियासत थी जिस पर ब्रिटिश साम्राज्य का सीधा शासन नहीं था. इन रियासतों को ये अधिकार दिया गया कि ये भारत और पाकिस्तान दोनों में से किसी भी देश के साथ विलय कर सकती हैं या फिर स्वयं को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर सकते है. यही से समस्या की शुरूआत होती है.
मकरान, लास बेला और ख़रान ने तो मोहम्मद अली जिन्ना के दबाव में पाकिस्तान में अपना विलय कर लिया लेकिन कलात के खान मीर अहमद ख़ान ने ख़ुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया. मार्च 1948 को पाकिस्तानी सेना ने कलात को जबरन पाकिस्तान में मिला लिया और खान ऑफ कलात मीर अहमद यार खान को जेल में डाल दिया.
खान ऑफ कलात मीर अहमद यार ख़ान जिसने कि पाकिस्तान के निर्माण को लेकर उत्साह दिखाया था, जिन्ना को अपना कानून सलाहकार नियुक्त किया. ताकि वह ब्रिटेन के सामने अपना पक्ष रख सके. 1946 में जब कैबिनेट मिशन भारत आया तो उसने इस पक्ष को मजबूती से रखा कि उसकी संधि ब्रिटेश इंडिया साम्राज्य के साथ नहीं बल्कि सीधे ब्रिटिश क्राउन (वाइट हाल) के साथ थी. कैबिनेट मिशन इसका कोई कानूनी समाधान नहीं ढूंढ पाई और मामले को बिना सुलझाए छोड़ दिया. इसके बाद 4 अगस्त 1947 को दिल्ली में एक राउंड टेबल मीटिंग हुई जिसमें लॉर्ड माउंटबेटन, खान ऑफ कलात, चीफ मिनिस्टर ऑफ कलात और मोहम्मद अली जिन्ना मौजूद थे जिसमें जिन्ना ने उनका पक्ष रखा. मुलाकात में तय हुआ कि 5 अगस्त 1947 को कलात ब्रिटिश साम्राज्य से स्वतंत्र होगा. साथ ही खारान, लॉस बुला को कहा गया कि वे अपना विलय कलात में करे. साथ ही मारी और बुग्ती इलाके भी कलात में शामिल हो ताकि पूरा बलूचिस्तान कलात में शामिल हो सके.
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 खान ऑफ कलात मीर अहमद यार ख़ान
कलात का कानूनी दर्जा अन्य भारतीय प्रिंसली स्टेट्स से अलग था. जहां 560 भारतीय राज्य कैटेगरी A के तहत आते थे, वही कलात, सिक्किम और भूटान कैटेगरी B में शामिल थे. 1876 की संधि के अनुसार ब्रिटेन ने उन्हें आतंरिक स्वतंत्रता दे रखी थी, साथ ही आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप ना करने का वादा भी था. वो कभी भी चेंबर ऑफ प्रिंसली स्टेट्स का सदस्य भी नहीं रहा. यही आधार था कि कलात भारत या पाकिस्तान दोनों में से किसी के साथ शामिल होने को मजबूर नहीं था. अंत में कलात के अंतिम शासक मीर अहमद खान ने दोनों देश से अलग एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने का फैसला किया. 15 अगस्त 1947 को पाकिस्तान के निर्माण के एक दिन बाद कलात ने स्वंय को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया. स्वतंत्रता की घोषणा के साथ ही खान ने कलात संसद के उच्च और निम्न सदन बनाए. कलात की नेशनल असेम्बली में 15 अगस्त 1947 को एक बैठक में यह निर्णय लिया गया कि कलात एक स्वतंत्र राष्ट्र होगा और पाकिस्तान के साथ उसका संबंध दोस्ताना रहेगा.
11 अगस्त 1947 को मुस्लिम लीग और कलात के बीच एक साझा घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर भी हुए जिसमें माना गया कि कलात एक भारतीय राज्य नहीं है और उसकी अपनी एक अलग पहचान है और मुस्लिम लीग कलात की स्वतंत्रता का सम्मान करती है. कलात के खान जिनके की जिन्ना के साथ अच्छे संबंध थे और जिन्होंने मुस्लिम लीग को काफी आर्थिक मदद की थी. इन सबके बावजूद 1 अप्रैल 1948 को पाकिस्तानी सेना ने कलात पर हमला कर दिया और कलात के खान ने आत्मसमर्पण कर दिया और विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिये. इसी के साथ ही 225 दिनों के आजाद कलात का पाकिस्तान में विलय हो गया. 
इसके बाद खान के भाई प्रिंस अब्दुल करीम के नेतृत्व में पहला विद्रोह हुआ. लेकिन उन्हें भी जल्द गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन इतिहास में सबसे बड़ा मोड़ आया वो साल 1954 था जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मोहम्मद अली बोगरा ने पाकिस्तान को वन यूनिट बनाने का फैसला किया. ईस्ट पाकिस्तान और वेस्ट पाकिस्तान और साल 1955 में अयूब खान ने इस पर मोहर लगा दी. वेस्ट पाकिस्तान के सभी स्टेट्स, प्रोविंसिज और कबिलाई इलाकों को मिलाकर वेस्ट पाकिस्तान बनाया गया. इन इलाकों के सारे अधिकार और स्वायत्ता छिन ली गई. बलूचिस्तान में इसका जबरदस्त विरोध हुआ. अक्टूबर 1957 में बलूच नेताओं ने पाकिस्तानी राष्ट्रपति इस्कन्दर मिर्ज़ा से मुलाकात कर कलात को वन यूनिट से बाहर रखने की मांग की. लेकिन अयूब खान ने ऐसा करने से मना कर दिया और इसके बाद वहां विद्रोह शुरू हो गया. 6 अक्टूबर 1958 को अयूब खान ने पाकिस्तानी आर्मी को बलूचिस्तान में भेज कलात के खान और उनके सहयोगियों को गिरफ्तार कर लिया. लेकिन खान के सहयोगी नवाब नवरोज खान ने संघर्ष जारी रखा लेकिन उन्हें भी जल्द गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया और नवरोज खान के बेटों और भतीजों को फांसी दे दी गई. नवरोज खान की भी जेल में रहने के दौरान मौत हो गई. इस पूरे संघर्ष में हजारों बलूच मारे गए.
इसके बाद साल 1973-74 में एक बार फिर बलूच और पाकिस्तान आर्मी के बीच संघर्ष हुआ जिसमें हजारों की संख्या में लोग मारे गए. 1971 के चुनाव में जहां पश्चिमी पाकिस्तान के सभी प्रांतों में पीपीपी की जीत हुई वही बलूचिस्तान और एनडब्लूएफपी (North-West Frontier Province) में नेशनल अवामी पार्टी की जीत हुई जो कि नेशनलिस्ट बलूचों की पार्टी थी. बलूचों पर आरोप लगे कि वो ईरान के साथ मिलकर एक बड़ा संघर्ष करने वाले है नतीजतन वहां की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया और जनरल टिक्का खान को बलूचिस्तान भेजा गया. पाकिस्तान 1971 की घटना से उभर नहीं पाया था और उसने बलूच आंदोलनकारियों पर बड़ी ही सख्ती से कार्रवाई की. वहां लगभग 80 हजारों पाकिस्तानी सैनिकों को भेजा गया और बलूचों पर हवाई हमले भी किये. बलूचिस्तान की तरफ जाने वाले सभी रास्ते बंद कर दिये गए. ज्यादातर बलूच नेता अफगानिस्तान भाग गए. ये 60 के दशक में हुए विद्रोह से काफी बड़ा था.
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 1973-74 में एक बार फिर बलूच और पाकिस्तान आर्मी के बीच संघर्ष हुआ जिसमें हजारों की संख्या में लोग मारे गए
इसके बाद साल 2005 में बलूच नेता नवाब अकबर खान बुग्ती और मीर मार्री ने पाक सरकार के सामने 15 सूत्री मांग रखी. जिसमें प्रांत के संसाधनों पर ज्यादा नियंत्रण और सैनिक ठिकानों के निर्माण पर रोक जैसे मुद्दे शामिल थे. इनकी यह मांग खारिज कर दी गई और संघर्ष चलता रहा. अगस्त 2006 में 79 साल के अकबर बुग्ती की सेना से मुठभेड़ में मौत हो गई. इसी संघर्ष में 60 पाकिस्तानी सैनिक और 7 अधिकारियों की भी मौत हो गई. बुग्ती की हत्या कराने का इल्ज़ाम परवेज़ मुशर्फ के ऊपर लगा हुआ है. इस घटना के कुछ दिन बाद सशस्त्र आंदोलनकारियों द्वारा परवेज मुशर्रफ के ऊपर राकेट से हमला किया गया जिसमें वे बाल-बाल बचे.
1948 से लेकर आज तक बलूच का विद्रोह जारी है. बलूच का मानना है कि वो पूर्व में एक स्वतंत्र राष्ट्र थे और सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से वो एक अलग पहचान रखते है. पाकिस्तान ने कलात के खान से बंदूक की नोंक पर विलय करवाया. आज बलूचिस्तान में हजारों बलूच लड़ाके पाकिस्तानी सेना के खिलाफ लड़ रहे है. बलूचिस्तान के लोग चाहते है कि भारत मामले में दखल दे जिस तरह उसने बांग्लादेश के मामले में किया था. लेकिन भारत अभी तक इसे पाकिस्तान का आंतरिक मामला मान चुप बैठा था. लेकिन लालकिले की प्राचीर से नरेंद्र मोदी द्वारा बलूचिस्तान का जिक्र आने के बाद लगता है कि भारत ने अपनी रणनीति बदली है. इससे बलूच लोगों में भी एक बार फिर आशा जगी है कि वो भारत की मदद से अपना हक पा सकेंगे.
इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

लेखक

आशुतोष शुक्लाआशुतोष शुक्ला @ashutosh.shukla.90
लेखक आजतक में प्रोड्यूसर हैं












https://www.ichowk.in/politics/how-an-independent-country-kalat-became-pakistan-occupied-baluchistan/story/1/4296.html

सोमवार, १४ जानेवारी, २०१९

चामडा बाजार, धारावी


बाजारगप्पा : कातडीपासून पर्सपर्यंत..
अशा या चामडा बाजाराला विविध देशी-परदेशींनी बनविलेल्या चित्रपट, लघुपटांमुळे प्रसिद्धी दिली.












भूलभुलैय्याशीच तुलना करता येईल अशा धारावीच्या छोटय़ा-छोटय़ा गल्ल्यांमध्ये आज लाखो कुटुंबं वस्ती करून आहेत. केवळ कुटुंबंच नव्हे तर त्यांचे छोटेमोठे व्यवसाय, कारखानेही याच गल्ल्यांमध्ये बिनधोक सुरू असतात. यातलाच एक म्हणजे चामडा बाजार.

मध्य रेल्वेच्या शीव स्थानकापासून उजव्या दिशेला साधारण एक किलोमीटर अंतरावर आशियातील सर्वात मोठय़ा झोपडपट्टीला सुरुवात होते. स्थानकाच्या एक क्रमांकाच्या फलाटापासून उजव्या हाताने दगडी पुलाच्या चिंचोळ्या बोगद्यातून पुढे गेल्यानंतर पहिल्यांदा मासळी बाजार लागतो. पुढे गेल्यावर चामडय़ाचे कमरेचे पट्टे, बॅगा, जॅकेट्स, वॉलेट्स यांची छोटय़ामोठय़ा दुकानांची दुतर्फा रांग नजरेला पडते. थोडं पुढे गेल्यावर रस्त्यांच्या दोन्ही बाजूला अनेक गल्ल्या दिसतात. या गल्ल्या म्हणजे भूलभुलैय्याच! एका गल्लीत शिरलात की पुन्हा त्याच गल्लीतून बाहेर पडाल याची शाश्वती नाही. गल्लीच्या दुतर्फा दोन-तीन मजल्यांची घरे दिसतात. प्रत्येक घरासमोर एक लोखंडी शिडी. चढताना पडू नये म्हणून आधाराला लटकणारी दोरी हमखास दिसते. प्रत्येक घरासमोर छोटे-छोटे नाले. कुठे तर नाला तुंबल्यामुळे पाणी साचून राहिलेले असते. त्यावर शेकडो माशा आणि डास घोंगावत असतात. अशा या धारावीच्या गल्ल्यांमध्ये लाखो कुटुंबं वस्ती करून आहेत. केवळ कुटुंबेच नव्हे तर त्यांचे छोटेमोठे व्यवसाय, कारखानेही याच गल्ल्यांमध्ये बिनधोक सुरू असतात.



धारावीच्या उद्यमशीलतेला मोठा इतिहास आहे. ब्रिटिश काळात, म्हणजे १८८२ साली विविध वस्तूंच्या उत्पादनांच्या निमित्ताने धारावी वसू लागली. ग्रामीण भागातून रोजगाराच्या शोधासाठी आलेल्या स्थलांतरितांनीच ती वसवली. मोकळी जागा मिळेल तिथे घरे बांधली गेली. गरजेप्रमाणे वाढविली गेली. अशी ही धारावी आज सुमारे सात लाख चौरस फुटापर्यंत पसरली आहे. येथे मराठी, हिंदी, दाक्षिणात्य, बंगाली, गुजराती, राजस्थानी, मुस्लीम अशा विविध जाती-धर्माचे लोक पाहावयास मिळतात. धारावीतील कारखान्यांमध्ये काम करणारे बहुतांश कारागीरही स्थलांतरित आहेत. बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल, दिल्ली या भागातून पैसे कमविण्यासाठी हे लोक धारावीत येतात. धारावीच्या एकेका गल्लीत किमान दहा कारखाने वसले आहेत. तेथे सतराशे साठ वस्तूंचे उत्पादन आणि विक्री होते. त्यापैकी सर्वात मोठी बाजारपेठ म्हणजे चामडय़ाची.

देवनार कत्तलखान्याबरोबरच मुंबईभरातून आलेल्या बकऱ्या, मेंढय़ा, बैल आणि म्हशी यांच्यापासून कातडे कमावण्याचा मोठा व्यवसाय इथे चालतो. याला ‘चामडा बाजार’ म्हणतात. कातडय़ापासून पुढे बॅगा, पट्टे, जॅकेट्स तयार करण्याचा व्यवयास पुन्हा इथल्याच चिंचोळ्या गल्ल्यांमध्ये वसला आहे. पशूंच्या कातडीचा उग्र दर्प नाकात घुसू लागला की चामडा बाजार आल्याचे आपोआप कळते. अशा वातावरणात सामान्य माणूस फार काळ राहू शकत नाही. परंतु येथील कामगार हा उग्र वास सहन करत कारखान्यांमध्ये तासनतास काम करीत असतात. नव्हे इथेच ते राहतात. त्यांचे जेवणखाण, झोप येथेच असते. धारावीतील प्रत्येक कारखान्यात हीच परिस्थिती आहे.

एका लहानशा खोलीत पशूंचे चामडे जाड मीठ लावून ठेवले जाते. बकरी आणि मेंढय़ाचे चामडे ५० ते ८० रुपयांपर्यंत खरेदी केले जाते. तर म्हैस किंवा बैल यांचे चामडे दीड ते दोन हजारापर्यंत खरेदी केले जाते. चामडे खराब होऊ नये यासाठी २४ तासांच्या आत त्यावर मीठ चोळतात. हे मीठ वापरातले नसते. मीठ लावल्यानंतर चामडे सात ते आठ फूट उंचीच्या रोलरमध्ये पाणी आणि काळ्या रंगाच्या पावडरचे रसायन टाकून धुतले जाते. १५ ते १७ तास हे चामडे धुतले जाते. तितका वेळ हे यंत्र सुरू असते. धुतलेले चामडे एकावर एक रचून ठेवतात. पाणी गळून गेल्यावर ते मऊ होण्याकरिता मोठय़ा यंत्राच्या साहाय्याने त्यावर इस्त्री फिरवली जाते. त्यानंतरही चामडे कडक वाटले तर कारखान्याबाहेरील दगडावर आपटून ते मऊ केले जाते. पुन्हा त्यावर इस्त्री फिरवून काही वेळ वाळवून हे चामडे रंगकाम करण्यासाठी पाठविले जाते.

ही एक वेगळीच खोली असते. खोलीभर दोरी बांधलेल्या असतात. चामडय़ावर रंगकाम करून वाळवण्यासाठी ते येथे टांगले जाते. त्यानंतर चामडे बॅगा, बेल्ट, शूज बनविणाऱ्या कारखान्यात पाठविले जाते. हा तयार माल शीव स्थानकाजवळील दुकानांमध्ये विक्रीकरिता येतो. महिलांसाठीच्या चामडय़ाच्या बॅगेची किंमत येथे २ हजारांपासून सुरू होते. तर चामडय़ाचे जॅकेट्स ३ हजारापासून पुढे १० हजारापर्यंत विकली जातात. यापुढे वांद्रे, अंधेरी, बोरिवली, मुलुंडच्या बडय़ा दुकांनांमधून ती कोणत्याही किमतीला विकली जाऊ शकतात. त्याशिवाय छोटय़ा पर्सेस आणि प्रवासाकरिता लागणाऱ्या मोठय़ा बॅगा ही देखील या बाजाराची खासियत. इथे बनलेल्या चामडय़ाच्या वस्तू गेली कित्येक वर्षे अनेक नामांकित ब्रँडने विकल्या जात आहेत. अशा या चामडा बाजाराला विविध देशी-परदेशींनी बनविलेल्या चित्रपट, लघुपटांमुळे प्रसिद्धी दिली. कारण धारावीकरांच्या आयुष्याबद्दल भारतीयांनाच नव्हे तर परदेशी पर्यटकांनाही आकर्षण असते. आज धारावी एका वेगळ्या प्रकारच्या पर्यटनाचा आनंद लुटू पाहणाऱ्या पर्यटकांकरिता ‘पिकनिक स्पॉट’ बनली आहे. कातडय़ांच्या या बाजारात अशी ‘गोरी’ कातडी फिरताना अनेकदा दिसते. पण धारावीच्या चामडा बाजाराला त्याचे अप्रूप राहिलेले नाही.



गोवंश हत्याबंदीचा रोजगारावर परिणाम

‘लेदर गुड्स मॅन्युफॅक्चरिंग असोसिएशन’च्या आकडेवारीनुसार धारावीत कातडी वस्तू उत्पादनाचे १५ हजार लघुउद्योग आहेत. येथे चामडय़ाच्या बाजारात काम करणाऱ्या कामगारांना महिन्याला ८ ते १० हजार इतका रोजगार मिळतो. मात्र गोवंश हत्याबंदीच्या कायद्यानंतर देवनार कत्तलखान्यातून येणाऱ्या कातडीच्या प्रमाणात घट झाल्यामुळे येथील कामगारांच्या रोजगारावर परिणाम झाला आहे.

अस्सल ‘लेदर’ कसे ओळखाल?

लेदरच्या नावाने विकल्या जाणाऱ्या बॅगा किंवा वस्तू या नेहमीच चामडय़ापासून बनलेल्या असतीलच असे नाही. बऱ्याचदा चामडय़ासारख्या दिसणाऱ्या बॅग फोम कापडापासून तयार केल्या जातात. मात्र चांगल्या दर्जाच्या लेदरला पशूंच्या कातडीचा उग्र वास येतो. तर लेदरला जाळले असता ते जळत नाही. या दोन पद्धतीतून खऱ्या लेदरची शहानिशा केली जाते. तर बकरी आणि मेंढीची कातडी पातळ असल्याने यांपासून तयार केलेल्या वस्तू पातळ असतात. तर म्हैस किंवा बैलांची कातडी जाड असल्याने हे लेदर टिकाऊ असते. त्यामुळे हे कातडे महागही असते.

















धारावीच्या उद्योगाला डिजिटल ओळख!

अशा प्रकारचा प्रयोग जगात प्रथमच करण्यात आल्याचे प्रा. अनिरुद्ध जोशी यांनी सांगितले.  

‘आयडीसी’च्या विद्यार्थ्यांने तयार केलेले उपकरण. 

‘आयडीसी’तील विद्यार्थ्यांचा अभिनव प्रकल्प
आशिया खंडातील सर्वात मोठी झोपडपट्टी अशी ओळख असलेली मुंबईच्या कुशीत वसलेल्या धारावी या महाकाय झोपडपट्टीत अब्जावधींची उलाढाल करणारे उद्योगही सुरू आहेत. एका विशिष्ट पठडीत उद्योग करणारी ही मंडळी आता आपल्या उद्योगाला वेगळय़ा वळणावर नेण्याचा प्रयत्न करत आहेत. नोव्हेंबर महिन्यात देशाच्या चलनातील पाचशे व एक हजार रुपयांची नोट रद्द केल्यानंतर या उद्योगांनी मोबाइल पाकिटांची मदत घेत डिजिटलकडे पहिले पाऊल टाकले. पण आता त्यांचे विपणन करण्यासाठीही डिजिटल माध्यमाचा वापर केला जाणार आहे. ही संकल्पना आयआयटी मुंबईतील अभिकल्प संस्थे (आयडीसी)तील चिन्मय परब या विद्यार्थ्यांने मांडली आणि ती यशस्वीही करून दाखविली.
गुगलने २०१५मध्ये बीकॉन उपकरण बाजारात आणले. या उपकरणाने काय करता येईल असे एक आव्हानही त्यांनी जगातील तमाम विद्यार्थ्यांपुढे ठेवले. यासाठी १०० उपकरणे ‘आयडीसी’मध्ये उपलब्ध करून देण्यात आली होती. हे उपकरण इंटरनेटवर आधारित असून इंटरनेटशी जोडणारी कोणतीही यंत्रणा याद्वारे काम करू शकणार आहे. मग या उपकरणाचा काय वापर करता येईल, यावर ‘आयडीसी’मध्ये विचार सुरू झला. यात संस्थेत ‘इंटरअ‍ॅक्शन डिझाइन’ या अभ्यासक्रमात शिकत असलेल्या चिन्मय परब या विद्यार्थ्यांने उद्योगांसाठी या उपकरणाचा वापर करता येईल अशी संकल्पना मांडली. त्याच्या या संकल्पनेला आयडीसीतील प्रा. अनिरुद्ध जोशी आणि ब्रिटनमधील स्व्ॉनसी विद्यापीठातील प्रा. मॅट जॉन यांनी मार्गदर्शन केले व ती संकल्पना प्रत्यक्षात आणली.
अशा प्रकारचा प्रयोग जगात प्रथमच करण्यात आल्याचे प्रा. अनिरुद्ध जोशी यांनी सांगितले. सध्या हे उपकरण अकरा दुकानांमध्ये बसविण्यात आले असून येत्या काळात १०० दुकानांमध्ये बसविण्याचा त्यांचा मानस आहे. तसेच आज हे उपकरण परदेशातून मागवावे लागते.
यामुळे त्याची किंमत ८०० रुपयांपर्यंत जाते पण जर भविष्यात या उपकरणाची निर्मिती आपल्या देशात झाली तर त्याचा खर्च ५०० ते ६०० रुपये इतकाच होणार असल्याचेही चिन्मयने नमूद केले.
ग्राहकांनाही फायदा
जेणेकरून धारावीत विशिष्ट गोष्टींची खरेदी करण्यासाठी गेलेल्या ग्राहकाला या यंत्रणेचा फायदा होईल. तसेच दुकानदाराला त्याला पाहिजे तो ग्राहक मिळू शकतो, असा विश्वास चिन्मयने व्यक्त केला.
संकल्पना काय?
हा प्रकल्प धारावीत उभारत असताना चिन्मयने एक ‘अँड्रॉइड टूल’ विकसित केले. या टूलच्या माध्यमातून अवघ्या चार क्लिकवर धारावीतील दुकानदाराचे संकेतस्थळ विकसित होते. हे संकेतस्थळ विकसित झाल्यावर त्यात दुकानातील उत्पादनांची माहिती दिली जाते. दुकानात बीकॉन उपकरण ठेवलेले असते.या उपकरणाला जोडण्यासाठी समोरच्या व्यक्तीच्या स्मार्टफोन किंवा इंटरनेट जोडणी असलेल्या फोनमधले ब्लू-टूथ सुरू असणे आवश्यक आहे.  या उपकरणामुळे दुकानाच्या आसपासच्या परिसरात ब्लू-टूथ सुरू असलेल्या फोनवर क्रोम ब्राऊझरच्या माध्यमातून एक नोटिफिकेशन जाते. या नोटिफिकेशनमध्ये दुकानाची थोडक्यात माहिती व एक लिंक दिलेली असते. ती लिंक सुरू केली की आपल्याला त्या दुकानात नेमकी कोणती उत्पादने आहेत व ती किती रुपयांना उपलब्ध आहेत याचा तपशील मिळतो.
धारावीची आजपर्यंतची ओळख ही एक झोपडपट्टी म्हणूनच होती. मात्र तेथे अनेक उद्योगही सुरू आहेत. यातील अनेक उद्योगांना भेटी देण्यासाठी तसेच धारावी नेमकी कशी आहे हे पाहण्यासाठी अनेक पर्यटकही तेथे येत असतात. या पर्यटकांना आपल्या दुकानाकडे आकर्षित करून घेण्यासाठी ही सुविधा उपयुक्त ठरेल.’
– चिन्मय परब, ‘आयडीसी’चा विद्यार्थी

















by - Loksatta नीरज पंडित |

बुधवार, २ जानेवारी, २०१९

कादर खान : 30 रोचक जानकारियां..


कादर खान : 30 रोचक जानकारियां








1) 1973 में अपने फिल्मी करियर की शुरुआत करने के बाद से, कादर खान 300 से अधिक फिल्मों में काम कर चुके हैं। उनकी पहचान अभिनेता और लेखक के रूप में है।


2) अपनी पहली फिल्म दाग में कादर खान ने, अभियोजन पक्ष के वकील की भूमिका निभाई थी।


3) कादर खान बॉम्बे युनिवर्सिटी के इस्माइल युसुफ कॉलेज से इंजीनियरिंग ग्रेज्यूएट हैं।


4) फिल्मों में करियर बनाने के पहले, कादर खान एमएच सैबू सिद्दिक कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में सिविल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर थे।


5) उनके पिता अब्दुल रेहमान खान कंधार के थे तो माता इकबाल बेगर पिशिन (अंग्रेजों के समय भारत का हिस्सा) से थीं।





6) कादर खान द्वारा कॉलेज में किए गए ड्रामा काम करने के बाद, दिलीप कुमार इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कादर खान को अपनी दो फिल्मों सगीना और बैराग के लिए साइन कर लिया।


7) कादर खान के तीन बेटे हैं। उनके एक बेटा कनाडा में रहता है और ऐसा कहा जाता है कि कादर खान के पास कनाडा की भी नागरिकता है।


8) कादर खान ने 250 से ज्यादा फिल्मों के संवाद लिखे हैं।


9) फिल्म 'रोटी' के लिए मनमोहन देसाई ने कादर खान को संवाद लिखने के लिए 1,20,000 रुपये जैसी बड़ी रकम अदा की थी।


10) कादर खान टेलीविजन पर एक कॉमेडी शो 'हंसना मत' प्रसारित कर चुके हैं। जिसे उन्होंने खुद बनाया था।



11) अमिताभ बच्चन के अलावा, कादर खान ऐसे कलाकार थे जिन्होंने प्रकाश मेहरा और मनमोहन देसाई के आपस में प्रतिस्पर्धी कैंपों में काम किया।



12) अमिताभ की कई सफल फिल्मों के अलावा, कादर खान ने हिम्मतवाला, कुली नं वन, मैं खिलाडी तू अनाड़ी, खून भरी मांग, कर्मा, सरफरोश और धर्मवीर जैसी सुपर हिट फिल्मों के संवाद लिखे हैं।


13) 2013 में, कादर खान को उनके फिल्मों में योगदान के लिए साहित्य शिरोमनी अवार्ड से नवाजा गया।


14) कादर खान 1982 और 1993 में बेस्ट डायलॉग के लिए फिल्म फेयर जीत चुके हैं।


15) कादर खान को 1991 को बेस्ट कॉमेडियन का और 2004 में बेस्ट सपोर्टिंग रोल का फिल्म फेयर मिल चुका है।

16) कादर खान 9 बार बेस्ट कॉमेडियन के तौर पर फिल्म फेयर में नामांकित किए जा चुके हैं।


17) अमेरिकन फेडरेशन ऑफ मुस्लिम फ्रॉम इंडिया (AFMI) कादर खान को उनकी सफलताओं और भारतीय मुस्लिम कम्युनिटी की भलाई में उनके कामों के लिए सराह चुकी है।


18) फिल्म 'रोटी' के अशरफ खान, अपने एक नाटक के लिए एक युवा लड़के की तलाश में थे तब उन्हें लोगों ने बताया कि एक लड़का रात में कब्रों के बीच बैठकर डायलॉग चिल्लाता है। यह कादर खान थे।


19) कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर फैलाई गई उनकी मौत की खबर से, कादर खान बहुत आहत हुए थे और उन्होंने कहा इससे उनके परिवार को खासा दुख पहुंचा है।


20) अपने बचपन के दिनों में कादर खान बहुत गरीब थे। गंदी बस्ती की झोपड़ी में रहने वाले कादर की मां उन्हें मस्जिद प्रार्थना के लिए भेजती थीं जहां से वे कब्रिस्तान चले जाते थे।

21) कादर खान के पास बचपन में चप्पल तक नहीं हुआ करते थे। उनकी मां उनके गंदे पैर देखकर समझ जाती थीं कि वह मस्जिद नहीं गए।


22) कादर खान की उनके पहले ही ड्रामे में एक्टिंग देखकर एक बुजुर्ग ने उन्हें सौ रूपए का नोट दिया था। कुछ साल अपने पास रखने के बाद, गरीबी के कारण कादर खान ने इस नोट को खर्च कर दिया जिसे वह एक ट्राफी समझते थे।

23) कादर खान के जन्म के पहले काबुल में रहने वाले उनके परिवार में उनके तीन बड़े भाई थे जो आठ वर्ष के होते-होते मर गए। इससे घबराकर कादर खान के जन्म के बाद, उनकी मां उन्हें लेकर मुंबई आ गईं।


24) कादर खान मानते हैं कि अच्छा लेखक बनने के लिए जिंदगी में बहुत दुख से गुजरना जरूरी है।


25) कादर खान कभी भी फिल्मों का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे क्योंकि उसके समय फिल्मों को निचले दर्जे की चीज समझी जाती थी।


26) कादर खान एक लेखक के तौर पर बहुत ही जल्दी सफल हुए क्योंकि वह बोलचाल की भाषा में संवाद लिखते थे वहीं दूसरी ओर पहले से जमे हुए लेखक कठिन मुहावरों से भरी भाषा लिखने के आदी थे।

27) कादर खान गालिब की गजलों को समझाती किताबें लिख चुके हैं। जिनमें 100 से भी अधिक गजलों के मतलब लिखे हुए हैं।


28) एक दौर ऐसा भी था जब कादर खान कई हीरो से ज्यादा लोकप्रिय थे और दर्शक पोस्टर पर उनका चेहरा देख टिकट खरीदते थे।


29) अश्लील और द्विअर्थी संवाद लिखने के कारण कादर खान कई बार आलोचकों के निशाने पर रहे।


30) बीमार होने के बाद कादर खान इस बात से हताश हो गए कि लोगों ने उनसे दूरी बना ली और काम देना बंद कर दिया।























by-http://hindi.webdunia.com/bollywood-focus/kader-khan-30-interesting-facts-115102100037_1.html









सोमवार, २४ डिसेंबर, २०१८

या ठिकाणी मिळतात भारतातील सगळ्यात स्वस्त लॅपटॉप …. किलोवर विकले जातात लॅपटॉप ….

या ठिकाणी मिळतात भारतातील सगळ्यात स्वस्त लॅपटॉप …. किलोवर विकले जातात लॅपटॉप ….

लॅपटॉपची किंमत त्याच्या कॉन्फिग्रेशनवर अवलंबून असते. लॅपटॉपचे हार्डवेअर कसे आहे, त्यासोबतच कोणत्या कंपनीचा आहे, यावर त्याची साधारणत: किंमत ठरत असते. यानुसार एका लॅपटॉपची किंमत 30 ते 40 हजार रुपयांदरम्यान असायला हवी. मात्र, भारतातील या मार्केटमध्ये तुम्ही नगाने नव्हे, तर चक्क 5000 रुपये किलोप्रमाणे लॅपटॉप खरेदी करू शकता. अन्यथा एक लॅपटॉपसाठी तुम्हाला 7 हजार रुपये मोजावे लागतील. हे लॅपटॉप सेकंडहँड असतात…
– दिल्ली येथील नेहरू पॅलेसमध्ये भरणाऱ्या या मार्केटला आशियातील सर्वात स्वस्त मार्केट मानले जाते.
– याठिकाणी लॅपटॉप, स्मार्टफोनसह इतर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणेही मिळतात.
– स्मार्टफोनला लागणाऱ्या अॅक्सेसरीजदेखील याठिकाणी मिळतात.
– नव्यासह जुने गॅजेट्सही याठिकाणी मिळतात. मात्र, तुम्हाला दोहोंतील फरक ओळखता यायला हवा.
हे ठेवा लक्षात
– याठिकाणी सेकंडहँडच्या खूप शॉप्स आहेत. त्यामुळे तुम्ही एखादी वस्तू खरेदी करीत असतांना बार्गेनिंग यायलाच हवी.
– तुमच्यासोबत गॅजेट्सची पारख असलेला व्यक्ती असल्यास सर्वोत्तम.
– या मार्केटमधून तुम्ही खरेदी करण्यापूर्वी वस्तू तपासून घ्या. त्याशिवाय गॅजेट्चे कॉन्फिग्रेशन तपासून बघा.
– लॅपटॉप घेण्यापूर्वी काही वेळ तो चालू करून पाहा.
– नव्या बॉक्समध्ये जुन्या वस्तू दिल्या जात नाही ना, याचीही खबरदारी जरूर घ्या.
– या मार्केटमधून एकाचवेळी अनेक वस्तू खरेदी केल्यास भरघोस डिस्काऊंटही मिळतो.

हे आहे भारतातील होलसेल कापड मार्केट...


हे आहे भारतातील होलसेल कापड मार्केट




येथे आम्ही तुम्हाला अशा मार्केटबद्दल सांगत आहोत, ज्यात तुम्हाला लहान मुले आणि मोठ्यांचे कपडे खूप स्वस्त मिळतील.











स्पेशल डेस्क - येथे आम्ही तुम्हाला अशा मार्केटबद्दल सांगत आहोत, ज्यात तुम्हाला लहान मुले आणि मोठ्यांचे कपडे खूप स्वस्त मिळतील. या होलसेल मार्केटमध्ये तुम्ही मनमुराद शॉपिंग करू शकता. हे दिल्लीच्या गांधीनगरचे मार्केट आहे. जे सीलमपूर मेट्रो स्टेशनजवळ येते, वेस्ट कांतिनगरच्या जवळ. येथे जीन्स असो वा टी-शर्ट वा शर्ट सर्वांचे 3 ते 12 पीस मिळतात. तुम्हाला असेच कपडे खरेदी करावे लागतील. सिंगल पीस तुम्ही खरेदी करू शकत नाहीत.





याबाबत आम्ही जेव्हा गांधीनगर मार्केटचे अध्यक्ष कंवल बाली यांच्याशी चर्चा केली तेव्हा ते म्हणाले की, या मार्केटमध्ये मध्यमवर्गातील ग्राहकांना लक्षात ठेवून कपडे बनवले जातात. प्रत्येक जण ब्रँडेड कपडे घेऊ शकत नाही. यामुळे या मार्केटमध्ये येऊन ते आपल्या गरजेनुसार कपडे खरेदी करू शकतात. या मार्केटमध्ये कपडे बनवलेही जातात आणि इतर प्रसिद्ध जागेवरून कपडे मागवून विक्रीही केली जाते. येथे टी-शर्ट तिरपूरहून येतात आणि लेडीज टॉप व सूट्स लखनऊवरून मागवले जातात. येथे लहंगेही खूप स्वस्त मिळतात.




3 शर्ट मिळतील 140 रुपयांत


या मार्केटमध्ये तुम्ही 3 शर्टचा सेट 140 रुपयांत खरेदी करू शकतात. म्हणजेच एक शर्ट तुम्हाला केवळ 46 रुपयांच्या आसपास मिळेल. हे शर्ट 15 वर्षांच्या मुलासाठी उदाहरण म्हणून सांगितले. यासोबतच तुम्हाला लहान मुलांचे टी-शर्टही 120 रुपयांच्या आसपास मिळून जाईल. यातही 3 पीस येतील. टी-शर्ट तुम्हाला मोठ्यांसाठी मिळतील. स्मॉलपासून ते XL, XLL साइज टी-शर्टही येथून घेऊ शकतात. 30 रुपयांपासून याच्या किमती सुरू होतात.





जीन्स केवळ 140 रुपयांत


या मार्केटमध्ये तुम्हाला जीन्स 140 रुपयांत मिळेल. येथेही तुम्हाला 3 ते 4 पीस घ्यावे लागतील. सर्वात महाग जीन्स तुम्हाला 350 रुपयांत मिळेल. येथे तुम्हाला 22 पासून 40 च्या साइजचे जीन्स मिळतील. एका सेटमध्ये एका कलरचेच जीन्स तुम्हाला मिळतील.





महत्त्वाचे... येथे बार्गेनिंगही होते


या मार्केटमध्ये एवढ्या किमतीत सर्व कपडे असूनही बार्गेनिंगही खूप होते. तुम्ही जेव्हाही येथे जाल तेव्हा बार्गेनिंग जरूर करा. रेट आणखी कमी होऊ शकतात. मुलींसाठी टॉप आणि सूटही येथे कमी किमतीत सहज मिळतील. मुलांसाठी शॉर्टस आणि महिलावर्गासाठी साड्याही मिळतील. येथे सेकंडहँड कपडे नसतात. सर्व फ्रेश आयटम्सच येथे ठेवले जातात.































































by - दिव्य मराठी वेब टीम |

गुरुवार, २० डिसेंबर, २०१८

उद्योगारंभी जरूर अभ्यासावीत अशी काही पुस्तके..

ही चौदा पुस्तके आपण नियमित वाचली तर असे अनेक फायदे आपल्याला जाणवतील. जसे एखादे नवीन पुस्तक वाचायला घेतल्यावर त्याची ४-५ पानं वाचूनच आपल्याला कळेल की हे पुस्तक तीन प्रकारांपैकी कोणत्या प्रकारचे आहे. की पुस्तके वाचताना दोन गोष्टींची मात्र काळजी घ्या. एक म्हणजे की ह्या पुस्तकांची डिजिटल प्रत जरी उपलब्ध आली तरी आपण ती मुद्रित स्वरूपातच वाचा आणि ही पुस्तके उत्तम आणि प्रसिद्ध असल्याने ह्यांचे अनेक भाषांत जरी अनुवाद केलेले आले तरी आपण ती पुस्तके इंग्रजीतूनच वाचा. ह्यांनी आपली इंग्रजी भाषा नुसतीच सुधारणार नाही तर आपण इंग्रजीवर प्रभुत्व मिळवू शकाल. 



1. हाऊ टू विन फ्रेंड्स अँड इन्फ्लुएन्स पीपल (How to win friends and influence people) लेखक : डेल कार्निगी या पुस्तकात सात अशा कल्पना ज्यांनी आपण लोकांना प्रभावित (impress) करू शकाल, सहा असे प्रकार ज्यांनी लोकांना आपण आवडू लागाल, बारा अशा पद्धती ज्यांनी आपण लोकांना आपले मुद्दे पटवून देऊ शकाल आणि सात अशा युक्त्या की ज्या आपण वापरलात तर लोक आपल्याला त्यांचा नेता (leader) मानतील. हे अतिशय उत्तम असे पुस्तक आहे आणि ते सर्वात पहिले वाचले पाहिजे. 


2. थिंक अँड ग्रो रिच (Think and grow rich) लेखक : नेपोलियन हिल हे पुस्तक लिहिणे तब्बल 20 वर्षे चालू होते, जे लिहिताना नेपोलियन हिल यांनी त्यांच्या काळातील पाचशे यशस्वी लोकांचा अभ्यास केला होता. ज्यात हेन्री फोर्ड, थॉमस एडिसन, अलेक्सान्डर ग्राहम बेल, जॉर्ज इस्टमन अशा अनेकांचा समावेश आहे. नेपोलियन हिल ह्या सगळ्यांना भेटले आणि प्रत्यक्षपणे त्यांना विचारले की इतके यशस्वी होण्यामागे नक्की काय रहस्य आहे, आपण कशाप्रकारे विचार केलेत, आपण कशा प्रकारे नियोजन केलेत इत्यादी आणि त्या मुलाखतींतून नेपोलियन हिल यांनी तेरा तत्त्वे लिहून काढली. ही तेरा तत्त्वे अशी आहेत जी कोणीही आचरणात आणली तरी तो नक्कीच यशस्वी होईल. आज जी कोणती स्वयं सहायक (self help) पुस्तके उपलब्ध आहेत ती याच तेरा तत्त्वांवर आधारलेली आहेत. त्याचसोबत या पुस्तकात तीस अशी कारणे दिलेली आहेत ज्यामुळे कोणताही मनुष्य अयशस्वी होतो आणि या पुस्तकातील वैशिष्ट्ये म्हणजे यात नेपोलियन हिल यांनी अशा सहा पायर्‍या दिल्या आहेत ज्या आपण आचरणात आणल्या तर आपण हवे तितके पैसे आपण कमवू शकतो. 


3. लॉज ऑफ सक्सेस (Laws of success) लेखक : नेपोलियन हिल नेपोलियन हिल हे जरी स्वयंप्रेरणा देणारी पुस्तके लिहिण्यात माहीर असले तरी त्यांचे गुरू, अँड्र्यू कार्नेगी जे एक उद्योजक होते त्यांनी नेपोलियन हिल यांना असे सांगितले की ‘थिंक अँड ग्रो रिच’ मधून आपण लोकांना श्रीमंत कसे व्हा हे तर सांगितलेत, परंतु खर्‍या जीवनात पैसे सोडता इतर आनंद कसा मिळवावा हे कुठे सांगितलेत? त्यावरून पुढे नेपोलियन हिल यांनी ‘लॉज ऑफ सक्सेस’ हे पुस्तक लिहिले. ज्यात असे लिहिले आहे की नुसतेच चांगले विचार करून कुणी यशस्वी होत नाही, तर त्यासाठी जबरदस्त चिकाटी आणि मेहनत करणे महत्त्वाचे असते. जसे नुसतेच चांगले विचार करून कुणी आय.ए.एस.ची परीक्षा काय तर दहावीसुद्धा पास करू शकणार नाही. तसेच आपल्याला अर्ध्या पाण्यानी भरलेल्या पेल्याची कथा बरेच जण सांगतात; पण जर आधी पेला पूर्ण भरलेला असेल आणि त्यातील अर्धे पाणी सांडले तर अर्धा पेला रिकामा आणि जर आधी पेला संपूर्ण रिकामा असेल आणि कष्टानी त्यात अर्धा पेला भरेल इतके पाणी जमवले तर अर्धा पेला भरलेला. अशा प्रकारचे विचार करायला लावेल असे हे पुस्तक. 


4. द सेव्हन हॅबिट्स ऑफ हायली इफेक्टिव्ह टीन्स (The seven habits of highly effective teens) लेखक : शॉन कवी हे पुस्तक सीन कवी यांनी लिहिलेल्या ‘द सेव्हन हॅबिट्स ऑफ हायली इफेक्टिव्ह पीपल’ या पुस्तकाची सोप्या शब्दांतील आवृत्ती आहे. यात अनेक उदाहरणे दिलेली आहेत तसेच या पुस्तकाचे वैशिष्ट्यम्हणजे या पुस्तकात अशाच गोष्टी दिल्या आहेत ज्या आपण आपल्या दैनंदिन जीवनात आचरणात आणू शकू. 


5. अ‍ॅज अ मॅन थिंकेथ (As a man thinketh) लेखक : जेम्स अ‍ॅलन यात असे सांगितले आहे की मनुष्य म्हणजे एक माळी आहे आणि त्याचा मेंदू म्हणजे एक बाग. आता आपण जशी एखाद्या बागेची पुरेपूर काळजी घेतली नाही तर आपोआपच त्यात खुरटी झाडे उगवतील. चांगले विचार म्हणजे नक्की काय आणि चांगले विचार करण्यासोबत वाईट विचार कसे कमीत कमी आपल्या मनात येतील याबद्दल स्वविस्तर माहिती या पुस्तकात दिली आहे.


 6. सी यू अ‍ॅट द टॉप (See you at the top) लेखक : झिग झिग्लर या पुस्तकात झिग झिग्लर यांनी यशस्वी होण्यासाठी आधी काय करावे, त्यानंतर काय करावे असे पायर्‍यांच्या रूपात दिले आहे. तसेच चुकीच्या सवयी कशा सोडाव्यात आणि चांगल्या सवयी कशा आत्मसात कराव्यात हेसुद्धा दिले आहे. जर आपण पहिल्या वर्षात शिकत असू तर हे पुस्तक वाचण्याचा हा उत्तम काळ आहे. 


7. रिच डॅड पुअर डॅड (Rich dad poor dad) लेखक : रॉबर्ट कियोसाकी या पुस्तकात रॉबर्ट कियोसाकी यांनी श्रीमंत लोक अधिकाधिक श्रीमंत कसे होत जातात आणि गरीब लोक अधिकाधिक गरीब कसे होत जातात ह्याची कारणे सांगितली आहेत. तसेच आपल्याला हेसुद्धा समजेल की आपण कोणतेही काम जेव्हा करतो तेव्हा ते उगाच न करता काही तरी शिकायला मिळेल असा विचार करून करावे. तसेच आपल्याजवळ असलेल्या पैशांचा वापर कुठे आणि कसा करायला हवा हेसुद्धा या पुस्तकात सांगितले आहे. 


8. चिकन सूप फॉर द सोल (Chicken Soup for the soul) लेखक: जॅक कॅनफिल्ड आणि मार्क हॅन्सन हा २४० पुस्तकांचा एक सेट असून त्यात लोकांनी लिहिलेल्या छोट्या-मोठ्या गोष्टी आहेत. जर आपण विद्यार्थी असाल तर आपण वाचू शकता ‘चिकन सूप फॉर स्टुडंट्स सोल.’ जर आपण तरुण असाल तर आपण वाचू शकता ‘चिकन सूप फॉर टिनेजर सोल.’, जर आपण शिक्षक असाल तर आपण वाचू शकता ‘चिकन सूप फॉर टीचर्स सोल’ इत्यादी. या पुस्तकाचे वैशिष्ट्ये असे की त्यात छोट्या छोट्या गोष्टी असल्याने दहा-बारा मिनिटांत एक गोष्ट वाचूनही होते. ह्या गोष्टी सर्वसामान्य लोकांनी लिहिलेल्या असल्याने त्या सोप्या भाषेत आहेत तसेच दैनंदिन जीवनात आपण जसे इंग्रजी वापरतो त्याच भाषेत आहे. चायनामध्ये काही ठिकाणी इंग्रजी शिकवण्यासाठी या पुस्तकांचा वापर केला जातो. 


9. द ऐटीन ट्वेन्टी प्रिंसिपल (The 18/20 Principle) लेखक: रिचर्ड कॉख तुम्ही जगाच्या कोणत्याही ठिकाणी जा, ऐंशी-वीस हे सगळीकडे आहे. म्हणजेच जगातील ऐंशी टक्के लोकांकडे वीस टक्के संपत्ती आहे, तर जगातील वीस टक्के लोकांकडे उरलेली ऐंशी टक्के संपत्ती आहे किंवा आता प्रश्नपत्रिका बघा: ‘ऐंशी टक्के प्रश्‍न हे वीस टक्क्यांच्या अभ्यासक्रमातून येतात आणि वीस टक्के प्रश्न हे बाकी ऐशी टक्के अभ्यासक्रमातून येतात तसेच कोणत्याही कामासाठीच्या मुलाखती बघा, ऐंशी टक्के लोकांची काम मिळण्याची शक्यता ही वीस टक्के असते तर वीस टक्के लोकांची निवड होण्याची शक्यता ऐशी टक्के असते. म्हणजेच हे पुस्तक वाचून आपल्याला कळेल की अशा कोणत्या गोष्टी आहेत ज्या वीस टक्के केल्या तरी आपल्याला ऐंशी टक्के फायदा मिळतो! आणि म्हणून त्या वीस टक्के गोष्टींवर आपल्याला ऐंशीं टक्के लक्ष केंद्रित करायचे आहे. हे पुस्तक वाचल्यावर आपल्याला आयुष्यात कधीच वेळेची कमतरता जाणवणार नाही. 


10. हाऊ टू गेट फ्रॉम व्हेअर यू आर, टू व्हेअर यू वॉन्ट टू बी (How to get from where you are, to where you want to be) लेखक : जॅक कॅनफिल्ड हे पुस्तक वाचण्याचा एक फायदा आणि एक तोटा आहे. तोटा म्हणजे असा की, हे पुस्तक वाचल्यावर आपल्याला असे वाटेल की, ह्या पुस्तकात अशी कोणती गोष्ट होती जी आपल्याला आधी माहीत नव्हती आणि फायदा असा की आपण स्वतःलाच असे विचारू की, जर मला हे सर्व अगोदरच ठाऊक होतं तर मी ह्याचा वापर केला का नाही. 


11. द पावर ऑफ लेस (The Power of Less) लेखक : लिओ बाबाउता हे पुस्तक वाचून आपली क्षमता प्रचंड वाढेल. आपला वेळ आणि पैसा उत्तमरीत्या कसा वापरायचा याबद्दल उत्तम मार्गदर्शन या पुस्तकात दिले आहे. आपला हल्लीच पगार झाला असेल तर हे पुस्तक आपण आजच वाचायला घेतले पाहिजे! 


12. ब्रेन रुल्स (Brain Rules) लेखक : जॉन मेडिना या पुस्तकात आपला मेंदू कसे काम करतो याचा उलगडा केला आहे. हे पुस्तक वाचून आपण आपल्याला किती झोप आणि किती व्यायाम गरजेचा आहे हे समजेल. आपली बुद्धी तर याने तल्लख होईलच शिवाय आपली स्मरणशक्तीसुद्धा वाढेल. 


13. 48 लॉज ऑफ पॉवर (48 Laws of power) लेखक : रॉबर्ट ग्रीन या जगात ऐंशी टक्के लोक हे खरंच चांगले आहेत; परंतु बाकी वीस टक्के लोक हे वाईट आहेत. आपलं नुकसान होऊन जरी त्यांना काही मिळणार नसेल तरी त्यांना आपलं सुख बघवत नसल्याने आपलं वाईट करायचं असतं आणि त्यात चिंतेची बाब अशी की, त्यांनी आपलं नुकसान करून झाल्यावर आपल्याला समजतं की कोण चांगलं आणि कोण वाईट. यातून आपल्याला वाचविणारे पुस्तक म्हणजे 48 लॉज ऑफ पॉवर. यात अनेक उदाहरणांतून शक्तीबद्दल काही नियम सांगितले आहेत. या पुस्तकाची भाषा मात्र समजायला जरा कठीण आहे. 




14. मास्टरी (Mastery) लेखक : रॉबर्ट ग्रीन हे पुस्तक वाचून आपल्याला कळेल की, आपण कोणत्या गोष्टीत सर्वोत्तम आहात. यात सहा तत्त्वे दिली आहेत आणि जर आपण त्यांचे तंतोतंत पालन केलेत तर आपले जीवन नक्कीच सफल होईल. भरपूर उदाहरणं दिली आहेत पुस्तकात, त्यातील इंग्रजी सोपे आहे, परंतु आपल्याकडे त्यासाठी शब्दसंग्रह मात्र हवा. त्यामुळे सर्वात शेवटी वाचावे हे पुस्तक. तर, आपण नक्कीच ही पुस्तके वाचा, ज्या क्रमात दिली आहेत त्या क्रमात वाचा आणि कमीत कमी आठ वेळा वाचा!















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